पंडित दीन दयाल उपाध्याय एंव मानवेन्द्र नाथ रॉय के शिक्षा सम्बन्धी विचारों का तुलनात्मक अध्ययनः नैतिकता एंव मानव कल्याण के सन्दर्भ में।
Abstract
तेजी से बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में शिक्षा केवल ज्ञान या कौशल का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं के विकास का प्रमुख साधन बन चुकी है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में शिक्षा के स्वरूप को लेकर अनेक विचारधाराएँ विकसित हुई हैं, जिनमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय और मानवेंद्र नाथ राय के दृष्टिकोण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उपाध्याय के एकात्म मानववाद और राय के रेडिकल ह्यूमेनिजम दोनों ही शिक्षा को मानव-मूल्यों के पोषण, सामाजिक समरसता और वैश्विक नागरिकता की भावना के निर्माण का माध्यम मानते हैं। यह शोध पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं मानवेंद्र नाथ राय के शिक्षा संबंधी विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करता है, विशेष रूप से नैतिकता और मानव कल्याण के संदर्भ में। उपाध्याय के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तित्व निर्माण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक आदर्शों का संवर्धन भी है। उनका दृष्टिकोण भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक-नैतिक विकास के संतुलन पर आधारित है, जिससे शिक्षा राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण और सामूहिक कल्याण को सशक्त कर सके।
इसके विपरीत, राय शिक्षा को धर्मनिरपेक्ष, तर्कसंगत और व्यक्ति-केंद्रति प्रक्रिया मानते हैं, जिसमें व्यक्ति की स्वायत्तता, आलोचनात्मक चिंतन और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों के विकास को प्रोत्साहित किया जाता है। इस शोध में दोनों विचारकों के मूल ग्रंथों, भाषणों और द्वितीयक व्याख्याओं के आधार पर तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसमें विशेष ध्यान इस बात पर दिया गया है कि कैसे प्रत्येक विचारक नैतिक उत्तरदायित्व, नागरिकता और सामाजिक समानता को अपनी शैक्षिक दृष्टि में समाहित करते हैं। निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों में नैतिक निर्माण और मानव कल्याण की आकांक्षा जैसी समानताएँ हैं, साथ ही धर्म की भूमिका, व्यक्तिगत स्वायत्तता और सामाजिक सुधार की दिशा में अंतर भी दिखाई देता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि उपाध्याय के सांस्कृतिक रूप से निहित नैतिक दृष्टिकोण और राय के सार्वभौमिक मानवतावादी दृष्टिकोण, दोनों मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत कर सकते हैं जो नैतिक नागरिकता और सतत मानव कल्याण को 21वीं सदी में सुदृढ बनाए। इस प्रकार यह शोध समकालीन शैक्षिक नीतियों और व्यवहार में भारतीय चिंतन की उपयोगिता को स्थापित करता है।
मुख्य शब्द: पंडित दीनदयाल उपाध्याय, मानवेंद्र नाथ राय, शिक्षा दर्शन, मानव कल्याण एकात्म मानववाद
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