हरिशंकर परसाई की रचना-दृष्टि में कबीर के समाज-सुधारक रूप और गांधी के राष्ट्रपिता रूप का विरोधाभासी चित्रण
Abstract
यह शोध-पत्र हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-साहित्य को कबीर की निर्गुण-समाज-सुधारक चेतना और गांधी की राष्ट्र-निर्माणवादी नैतिकता के संदर्भ में रखकर उनके विरोधाभासी और संश्लेषात्मक रूपों का विश्लेषण करता है। कबीर ने अपने युग में धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध निर्भीक आवाज़ उठाई, वहीं गांधी ने बीसवीं शताब्दी में उसी चेतना को अहिंसा, सत्याग्रह और ग्राम-लोकतंत्र के रूप में पुनर्परिभाषित किया। परसाई की दृष्टि में यह दोनों परंपराएँ आदर्श तो हैं, किंतु इनका अंधानुकरण आधुनिक समाज में नया पाखंड भी रच सकता है। अतः परसाई अपने व्यंग्य के माध्यम से दोनों विचारधाराओं की सीमाओं को पहचानते हुए एक लोकतांत्रिक तर्कशीलता का मार्ग सुझाते हैं। यह अध्ययन दिखाता है कि परसाई का साहित्य आधुनिक भारत के नैतिक विवेक का पुनर्निर्माण करता है, जहाँ हँसी के भीतर गहरी मानवीय करुणा और सामाजिक आत्मालोचन की चेतना छिपी है।
कीवर्ड- हरिशंकर परसाई, कबीर, महात्मा गांधी, समाज-सुधार और नैतिकता, व्यंग्य और आत्मालोचन, लोकतांत्रिक चेतना
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