आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
Abstract
भारत ने सदियों से आत्मनिर्भरता के सिद्धान्त को अपनी सभ्यता की आत्मा के रूप में अपनाया है। प्राचीन भारत में गाँव आधारित अर्थव्यवस्था, स्थानीय उत्पादन और स्वदेशी व्यापार व्यवस्था ने इसे विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान दिलाया था। परन्तु औपनिवेशिक काल ने इस संरचना को तोड़कर भारत को आयात-निर्भर बना दिया। स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास किया, परन्तु वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव ने देश को पुनः बाह्य निर्भरता की ओर धकेला।
इक्कीसवी शदी में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान, विश्व ने यह अनुभव किया कि अत्यधिक वैश्विक निर्भरता से किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। इसी पृष्ठभूमि में ”आत्मनिर्भर भारत अभियान“ का सूत्रपात हुआ। यह पहल केवल आत्मनिर्भरता का घोषणापत्र नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक पुनर्स्थापना की दिशा में एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इस शोध पत्र में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा, उसकी नीतिगत संरचना, औद्योगिक, कृषि, तकनीकी और सेवा क्षेत्र में उसका प्रभाव, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति, तथा आत्मनिर्भरता के मार्ग में उपस्थित चुनौतियों और संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन इस तथ्य को रेखांकित करता है। कि आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। मुख्य निष्कर्ष यह है कि आत्मनिर्भर भारत का उद्देश्य भारत को एक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केन्द्र बनाना है, जहाँ भारत अपनी आंतरिक शक्ति और नवाचार के बल पर विश्व अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाए।
मुख्य शब्द-आत्मनिर्भर भारत, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक नीति, मेक इन इंडिया, नवाचार, स्वदेशी औद्योगिक विकास, तकनीकी प्रगति।
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