भारत में शैक्षिक नीति का विकासः स्वतंत्रता (1947) से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तक एक ऐतिहासिक विश्लेषण
Abstract
भारत में शैक्षिक नीति का प्रक्षेपवक्र औपनिवेशिक विरासत से एक आत्मनिर्भर, समावेशी और आधुनिक ढांचे की ओर एक जटिल यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है। 1947 में स्वतंत्रता के समय, भारत को एक ऐसी जर्जर शिक्षा व्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसे केवल ब्रिटिश प्रशासन की सेवा के लिए बनाया गया था। साक्षरता दर मात्र 12 प्रतिशत थी और उच्च शिक्षा केवल अभिजात वर्ग तक सीमित थी। इस ऐतिहासिक विश्लेषण का उद्देश्य यह समझना है कि कैसे विभिन्न विद्वानों और नीतियों ने भारतीय शैक्षिक परिवेश को बदला है। प्रारंभिक दौर में राधाकृष्णन और मुदालियर आयोगों ने विश्वविद्यालय और माध्यमिक शिक्षा की शैक्षणिक नींव रखी। 1968 की पहली नीति ने राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया, जबकि 1986 की नीति ने आधुनिकीकरण और पहुँच को प्राथमिकता दी। 21वीं सदी में, सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम ने नामांकन को सार्वभौमिक बनाया। वर्तमान में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक बहु-विषयक और लचीले ढांचे के माध्यम से रटने वाली शिक्षा का अंत करने का प्रयास कर रही है। यह यात्रा दर्शाती है कि भारतीय शिक्षा अब संख्यात्मक विस्तार से हटकर गुणात्मक उत्कृष्टता की ओर बढ़ चुकी है। शिक्षा अब केवल साक्षरता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का एक अनिवार्य उपकरण बन गई है। यह शोध पत्र विभिन्न आयोगों के दार्शनिक आधारों और उनके द्वारा समाज पर डाले गए दीर्घकालिक प्रभावों की विवेचना करता है। अंततः, यह विश्लेषण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भारत की वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनने की आकांक्षा उसके निरंतर विकसित होते शैक्षिक ढांचे और नीतिगत सुधारों में निहित है।
मुख्य शब्द- शैक्षिक नीति, राधाकृष्णन आयोग, कोठारी आयोग, सर्व शिक्षा अभियान, त्ज्म् अधिनियम, छम्च् 2020, ऐतिहासिक विश्लेषण, सामाजिक न्याय, बहु-विषयक शिक्षा, समावेशिता।
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