शास्त्रोक्त कर्मयोग एवं विकसित भारत
Abstract
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, जहाँ आर्थिक प्रगति, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा नैतिक मूल्यों की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। इस संदर्भ में भारतीय दार्शनिक परंपरा में वर्णित शास्त्रोक्त कर्मयोग की अवधारणा विशेष महत्त्व रखती है। कर्मयोग, विशेषतः श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित निष्काम कर्म, कर्तव्यपरायणता, आत्मअनुशासन तथा लोकसंग्रह की भावना पर आधारित है। यह केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास का व्यावहारिक मार्ग भी प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत अध्ययन में शास्त्रोक्त कर्मयोग के सिद्धांतों का विकसित भारत की संकल्पना के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यदि शासन, शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, कृषि तथा युवा शक्ति में कर्मयोग के मूल्यों को आत्मसात किया जाए, तो राष्ट्र में उत्तरदायित्व, नैतिकता, कार्यक्षमता तथा सामाजिक समन्वय को सुदृढ़ किया जा सकता है। कर्मयोग व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर राष्ट्रहित एवं मानव कल्याण की ओर प्रेरित करता है, जो विकसित भारत की आधारशिला बन सकता है। अतः शास्त्रोक्त कर्मयोग आधुनिक भारत के सर्वांगीण विकास हेतु एक प्रभावी नैतिक एवं सांस्कृतिक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
मुख्य शब्द- कर्मयोग, निष्काम कर्म, श्रीमद्भगवद्गीता, नैतिक मूल्य, राष्ट्र निर्माण, आत्मअनुशासन, लोकसंग्रह
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