भक्तिकालीन कृष्ण काव्य धारा के महाकवि सूरदास एवं उनका काव्य
https://doi.org/10.5281/zenodo.20566895
Abstract
हिंदी साहित्य जगत में भक्तिकाल को ‘स्वर्ण काल‘ कहा जाता है। इस काल को स्वर्णिम युग बनाने में जिन कवियो का योगदान रहा है। उनमें महाकवि सूरदास अग्रणी है। सूरदास कृष्ण भक्ति काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि है। सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी उनकी प्रमुख रचनायें हैं, जिनमें से सूरसागर को महाकाव्य की श्रेणी मंे गिना जाता है। सूरदास ने अपने काव्य में श्रीकृष्ण की लीलाओ का सुन्दर और सजीव चित्रण किया है। भक्तिकाल के दूसरे कवियो का सुंदर और सजीव चित्रण किया है। भक्तिकाल के दूसरे कवियो ने कल्पना लोको की सृष्टि की है, जबकि सूरदास ने जीवन के यथार्थ और अनुभूति को अपने काव्य में सृजन किया है। ब्रज के ग्राम जीवन की युक्त और विस्तृत भूमि पर कृष्ण के चरित्र द्वारा सूरदास काव्य का वितान विकसित हुआ है। सूरदास काव्य महज भागवत भजन नहीं अपितु उसमें भावनाओं का अपार सागर है। यह प्रेम के आकष्ठ में डूबे जीवन जीने की कला है।
मुख्य शब्दः- कृष्ण काव्य धारा, भक्ति भावना, कल्पना शक्ति, जीवनानुभूति, प्रेम सौन्दर्य, भगवत भजन।
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