स्वतंत्र भारत में पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित नीतियों का व्यावहारिक प्रभाव

https://doi.org/10.5281/zenodo.20579654

Authors

  • डॉ. मधुप कुमार

Abstract

भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कानून और नीतियाँ बनाए गए हैं, जिनका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है। जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1974 और 1977, देश में जल स्रोतों को प्रदूषण से मुक्त रखने और स्वच्छ जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पारित किए गए। इसके तहत केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की स्थापना की गई, जिन्हें जल गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई का अधिकार दिया गया। वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1981 का उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों, मोटर-वाहनों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषकों का नियंत्रण करना और वायु गुणवत्ता बनाए रखना है। इसमें राज्यों को प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र घोषित करने और औद्योगिक गतिविधियों पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है। 1987 में इसमें ध्वनि प्रदूषण को भी शामिल किया गया। वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम, 1972, वन्य प्राणियों और पौधों की संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के लिए बनाया गया। इसमें अवैध शिकार और व्यापार पर रोक, राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्यों का प्रबंधन, और वन्यजीवन परामर्श बोर्ड की स्थापना शामिल है। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वनों के अंधाधुंध विनाश को रोकने, वनों के संरक्षण और पुनरोद्धार को बढ़ावा देने तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने हेतु पारित किया गया। ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए विशेष कानून नहीं है, पर वायु अधिनियम, 1981 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत ध्वनि को प्रदूषण का प्रमुख स्रोत मानकर नियंत्रण के नियम बनाए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ध्वनि स्तर मानक, शांत क्षेत्रों की सुरक्षा और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की व्यवस्था है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, भारत का व्यापक कानून है, जो वायु, जल, भूमि और जैव विविधता के संरक्षण हेतु केंद्र और राज्य सरकारों को शक्तियाँ प्रदान करता है। इसमें नागरिकों को भी पर्यावरण उल्लंघन की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। जैव-विविधता अधिनियम, 2002, जैविक संसाधनों के संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ वितरण सुनिश्चित करता है। इसके तहत राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर प्राधिकरणों और समितियों की स्थापना की गई। राष्ट्रीय जल नीति, 2002, जल संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग, संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करती है, जबकि राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2004, विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाए रखने, संकटग्रस्त संसाधनों की रक्षा और नागरिकों के स्वस्थ पर्यावरण में जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने पर जोर देती है। वन अधिकार अधिनियम, 2006, वनवासियों और जनजातियों के वन संसाधनों पर वैध अधिकार प्रदान करता है और वन संरक्षण में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करता है। इन सभी कानूनों और नीतियों के बावजूद भारत में जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण, वन कटाव और जैव विविधता हानि जैसी समस्याएँ गंभीर बनी हुई हैं। न्यायपालिका ने स्वच्छ पर्यावरण को मौलिक अधिकार मानकर जनहित याचिकाओं, प्रदूषित इकाइयों की बंदी, सी.एन.जी का प्रयोग, और पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से संरक्षण को बढ़ावा दिया है। भारत में पर्यावरण संरक्षण में कानून, नीति और न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता के लिए नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और नीति के गंभीर क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
मुख्य शब्द- पर्यावरण संरक्षण, जल, वायु, ध्वनि और वन प्रदूषण इत्यादि।

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Published

31-05-2026

How to Cite

डॉ. मधुप कुमार. (2026). स्वतंत्र भारत में पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित नीतियों का व्यावहारिक प्रभाव: https://doi.org/10.5281/zenodo.20579654. Ldealistic Journal of Advanced Research in Progressive Spectrums (IJARPS) eISSN– 2583-6986, 5(05), 79–90. Retrieved from https://journal.ijarps.org/index.php/IJARPS/article/view/1230

Issue

Section

Research Paper