महिलाओं तक मानवाधिकारों की अधूरी पहुँच

DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21102925

Authors

  • डॉ0 ऋचा सिंह राठौर, डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

Abstract

सामाजिक अवधारणा आज से नहीं बल्कि आरम्भिक दौर से ही स्त्री और पुरुष के आपसी समन्वय से ही क्रियान्वित होती आई है. समय के साथ-साथ भले ही सामाजिक सञ्चालन में भूमिकाओं में किंचित परिवर्तन देखने को मिले हों किन्तु सभी इंसानों के अधिकारों के लिए समाज में सक्रियता बनी रही है. मानवीय गरिमा, प्रतिष्ठा आदि को लेकर प्रतिस्थापित अधिकारों को समय-समय पर कानूनी स्वरूप दिया जाता रहा. इसी के आधार पर मानवाधिकारों का वर्तमान स्वरूप सामने आया है. मानवाधिकारों के क्रियान्वयन में स्त्री और पुरुष के रूप में किसी भी तरह के भेदभाव को दूर करने को प्रमुखता दी गई किन्तु कालांतर में ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे महिलाओं के प्रति मानवाधिकारों को लेकर कतिपय विभेदकारी स्थितियाँ बनी हुई हैं. महिलाओं के साथ होने वाली शारीरिक हिंसा, बलात्कार, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, अपहरण आदि ऐसी ही विकृत स्थितियाँ हैं. इनमें भी सबसे विद्रूप चेहरा यह है कि महिलाएँ इक्कीसवीं सदी में भी घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं. प्रस्तुत शोध-पत्र में मानवाधिकारों की स्थापना के साथ-साथ महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर प्रकाश डालते हुए उनके समाधान खोजने का प्रयास किया गया है।
मुख्य शब्द- महिला मानवाधिकार, लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार संरक्षण, सामाजिक न्याय, लैंगिक भेदभाव, कानूनी अधिकार एवं न्याय, महिला सुरक्षा एवं गरिमा

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Published

30-06-2026

How to Cite

डॉ0 ऋचा सिंह राठौर, डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर. (2026). महिलाओं तक मानवाधिकारों की अधूरी पहुँच: DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21102925. Ldealistic Journal of Advanced Research in Progressive Spectrums (IJARPS) eISSN– 2583-6986, 5(06), 41–45. Retrieved from https://journal.ijarps.org/index.php/IJARPS/article/view/1247

Issue

Section

Research Paper