कल्याणकारी राज्य की बदलती अवधारणा और भारत में सामाजिक न्याय की राजनीतिः एक समकालीन विश्लेषण
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21470182
Abstract
कल्याणकारी राज्य आधुनिक लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था की एक ऐसी अवधारणा है जिसका मूल उद्देश्य प्रत्येक नागरिक के जीवन स्तर को उन्नत बनाना, सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को कम करना तथा समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् विश्व के अनेक देशों में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को व्यापक स्वीकृति मिली। भारत ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व के आदर्शों के माध्यम से स्वयं को एक लोकतांत्रिक एवं कल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। भारतीय संविधान के नीति-निदेशक तत्वों ने राज्य को यह दायित्व सौंपा कि वह नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कल्याण को सुनिश्चित करे तथा समाज के कमजोर एवं वंचित वर्गों के उत्थान के लिए विशेष उपाय अपनाए। समय के साथ वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल प्रशासन, आर्थिक सुधार तथा बाजारोन्मुख नीतियों ने कल्याणकारी राज्य की पारंपरिक अवधारणा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। आज राज्य केवल प्रत्यक्ष सेवा प्रदाता नहीं रह गया है, बल्कि वह नियामक, सहयोगी तथा सहभागी की भूमिका भी निभा रहा है। इसी परिवर्तन के साथ भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति भी नए आयामों के साथ विकसित हुई है। सामाजिक न्याय अब केवल आरक्षण या संवैधानिक संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, आर्थिक समावेशन, डिजिटल समावेशन, सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास, वित्तीय समावेशन, पर्यावरणीय न्याय तथा सतत विकास जैसे विषय भी शामिल हो चुके हैं। भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति का विकास स्वतंत्रता के पश्चात् अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारों से प्रारंभ होकर महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगजनों, वरिष्ठ नागरिकों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा अन्य वंचित समुदायों तक विस्तृत हुआ है। लोकतांत्रिक राजनीति में सामाजिक न्याय एक प्रमुख चुनावी, नीतिगत एवं वैचारिक मुद्दा बन चुका है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे अपनी नीतियों एवं घोषणापत्रों का केंद्रीय विषय बनाया है। साथ ही प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधार, जन-धन, आयुष्मान भारत, मनरेगा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने कल्याणकारी राज्य की नई कार्यप्रणाली को आकार दिया है।
यह शोध-पत्र कल्याणकारी राज्य की बदलती अवधारणा का ऐतिहासिक, सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति पर उसके प्रभाव का समग्र अध्ययन करता है। अध्ययन में गुणात्मक तथा द्वितीयक स्रोतों पर आधारित विश्लेषणात्मक शोध-पद्धति का उपयोग किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि समकालीन भारत में कल्याणकारी राज्य की सफलता केवल योजनाओं के विस्तार पर निर्भर नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, समावेशिता तथा न्यायपूर्ण वितरण पर भी समान रूप से निर्भर करती है।
प्रमुख शब्द- कल्याणकारी राज्य, सामाजिक न्याय, भारतीय संविधान, नीति-निदेशक तत्व, लोकतंत्र, सामाजिक समावेशन, आरक्षण, सार्वजनिक नीति, समावेशी विकास, सुशासन।
Additional Files
Published
How to Cite
Issue
Section
License

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.