डिजिटल युग में पारिवारिक संबंधों का बदलता स्वरूपः सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21470444
Abstract
इक्कीसवीं शताब्दी को डिजिटल क्रांति का युग कहा जाता है। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा ऑनलाइन संचार के तीव्र विस्तार ने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। इन परिवर्तनों का सबसे गहरा प्रभाव परिवार संस्था तथा पारिवारिक संबंधों पर देखा जा सकता है। भारतीय समाज में परिवार सदैव सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों के संरक्षण का प्रमुख माध्यम रहा है। परिवार न केवल व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण का आधार है, बल्कि सामाजिक नियंत्रण, भावनात्मक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग तथा सांस्कृतिक हस्तांतरण का भी प्रमुख केंद्र है। किंतु डिजिटल युग के आगमन के साथ पारिवारिक जीवन की संरचना, कार्यप्रणाली तथा सदस्यों के मध्य अंतःक्रियाओं में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य डिजिटल तकनीकों के कारण पारिवारिक संबंधों में उत्पन्न परिवर्तनों का समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करना है। अध्ययन में द्वितीयक स्रोतों पर आधारित वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति का प्रयोग किया गया है। विभिन्न शोध-पत्रों, पुस्तकों, सरकारी रिपोर्टों, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रकाशनों तथा डिजिटल मीडिया से प्राप्त तथ्यों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है।
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि डिजिटल तकनीकों ने पारिवारिक जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन भी लाए हैं। दूरस्थ परिवारों के बीच संचार सुगम हुआ है, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन, डिजिटल बैंकिंग तथा कार्य-स्थल की लचीलापन ने परिवारों को नई सुविधाएँ प्रदान की हैं। विदेशों अथवा अन्य शहरों में रहने वाले परिजन वीडियो कॉल, सोशल मीडिया तथा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से निरंतर संपर्क में रह सकते हैं। दूसरी ओर, अत्यधिक स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की लत, पारिवारिक संवाद में कमी, भावनात्मक दूरी, वैवाहिक तनाव, बच्चों में व्यवहारगत परिवर्तन, साइबर अपराध तथा गोपनीयता संबंधी चुनौतियाँ भी तेजी से बढ़ी हैं। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि डिजिटल युग में पारिवारिक संबंधों का स्वरूप पारंपरिक प्रत्यक्ष संवाद से हटकर आभासी संवाद की ओर अग्रसर हुआ है। इससे संबंधों की गुणवत्ता, विश्वास, भावनात्मक निकटता तथा सामाजिक मूल्यों पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से बच्चों एवं किशोरों के समाजीकरण, बुजुर्गों की सामाजिक भागीदारी तथा पीढ़ियों के मध्य संवाद में नए प्रकार की चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डिजिटल तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका अनियंत्रित एवं असंतुलित उपयोग पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करता है। आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल साक्षरता, डिजिटल अनुशासन, पारिवारिक संवाद, साझा समय, नैतिक मूल्यों तथा संतुलित तकनीकी उपयोग को बढ़ावा दिया जाए ताकि डिजिटल प्रगति एवं स्वस्थ पारिवारिक संबंधों के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सके।
मुख्य शब्द- डिजिटल युग, परिवार, पारिवारिक संबंध, सोशल मीडिया, स्मार्टफोन, डिजिटल संचार, परिवार संस्था, स्क्रीन टाइम, डिजिटल साक्षरता, सामाजिक परिवर्तन।
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