‘मिश्र‘ जी के नवगीतों में राष्ट्रीय चेतना
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21802192
Abstract
संस्कृत साहित्य भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर है। हजारों वर्षो से निरन्तर यह अपनी अन्तर्निहित ज्ञान की थाती से हमारे चिंतन और भावबोध की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनी हुई है। यह साहित्य केवल प्राचीन काल की अभिव्यक्ति ही नहीं अपितु सतत् प्रवाहमान परंपरा हैं जो समय समय पर नवीन संदर्भो में अपने ंस्वरूप को परिवर्तित करते हुए समाज के मार्गदर्शन का कार्य करती रही है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में जहॉ धर्म,नीति, आदर्श और जीवन मूल्यों का प्रतिपादन मिलता हैं वहीं आधुनिक संस्कृत साहित्यकारों ने अपनी अक्षर तूलिका के माध्यम से समकालीन समस्याओं, विसंगतियो और राष्ट्रीय चेतना को अपनी कृतियों में स्थान देकर इसी परंपरा को जीवंत बनाए रखा है। इन्हीं आधुनिक साहित्यकारों में एक नाम ‘अभिराज‘ प्रो0 राजेन्द्र मिश्र का भी हैं जिन्होंने आधुनिक काव्य में सामाजिक मूल्यों का गहन और गंभीर चिंतन किया तथा संस्कृत गीत काव्य परंपरा को समकालीन राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। मिश्र जी ने अपने नवगीतों मंे राष्ट्र प्रेम, सांस्कृतिक गौरव, नैतिकता,समरसता और मानवीय मूल्यों का अत्यन्त प्रवाहपूर्ण चित्रण किया है। प्रस्तुत शोधपत्र में मिश्र जी नवगीतों के माध्यम से सामाजिक चेतना, एवं राष्ट्रीय भावना से युक्त विविध दृष्टान्त प्रस्तुत किये जायेंगे जिसमें मिश्र जी ने राष्ट्रीयता,देशप्रेम के यशोगान के साथ साथ भारतीय समाज की दुष्प्रवृत्तियों को भी पाठक के सामने अत्यन्त बेबाकी के साथ रखकर राष्ट्रीय प्रेम को प्रकट किया है। निःसंदेह डॉ राजेन्द्र मिश्र आधुनिक संस्कृत साहित्य के विशिष्ट एवं सशक्त रचनाकार है।
मुख्य शब्द- संस्कृत भाषा, साहित्य, परम्परा, भारत, राष्ट्रीय एकता,राजेन्द्र मिश्र, विश्वशान्ति, सामाजिक चेतना,लोकतन्त्र, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्र भक्ति,विश्वबन्धुत्व,वाग्वधूटी, श्रुतिम्भरा,मधुपर्णी, मृद्वीका, सद्भाव ,स्वदेश, भारत भूमि, धरोहर,समकालीन, आदि।
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