‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ में स्त्री-जीवन का यथार्थः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.22197024
Abstract
इस शोध पत्र में अब्दुल बिस्मिल्लाह के प्रसिद्ध उपन्यास ’झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ में चित्रित बनारस के बुनकर समाज की स्त्रियों के जीवन-यथार्थ का आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है। इसमें बनारस के बुनकर परिवेश की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक जटिलताओं के बीच स्त्री के जीवन-संघर्ष, श्रम, अस्तित्व, अस्मिता एवं पहचान के संकट के प्रश्न को पूरी संजीदगी से उठाया गया है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उपन्यास में चित्रित स्त्री पात्रों की सामाजिक,आर्थिक एवं धार्मिक स्थितियों,उनके श्रम, संघर्ष, अस्मिता बोध तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उपन्यास की स्त्रियाँ दोहरे संघर्ष का सामना करती हैं। एक ओर वे आर्थिक अभाव, गरीबी और सामाजिक शोषण से जूझती हैं, वहीं दूसरी ओर पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पारिवारिक बंधनों का भी सामना करती हैं। तथापि वे अपने परिवार की आर्थिक व्यवस्था के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उपन्यास की स्त्रियाँ केवल पीड़ित नहीं हैं, बल्कि उनमें आत्म-चेतना, आत्मसम्मान और परिवर्तन की आकांक्षा भी मौजूद है।वे अपने अस्तित्व,अस्मिता एवं पहचान के प्रति जागरूक दिखाई देती हैं।
प्रमुख शब्दः स्त्री जीवन, यथार्थवाद, बुनकर समाज, आत्मचेतना, अस्तित्व, स्त्री-विमर्श, अस्मिता, श्रम, पितृसत्तात्मक व्यवस्था
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