शिक्षा से स्वावलंबनर: गांधीवादी दृष्टिकोण का एक अध्ययन
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.22985862
Abstract
भारतीय चिंतन परंपरा में शिक्षा को सदैव केवल ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण के माध्यम के रूप में देखा गया है। महात्मा गांधी ने भी शिक्षा को इसी व्यापक दृष्टि से समझा तथा इसे मानव जीवन के नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास से जोड़ने का प्रयास किया। गांधी के अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो आत्मनिर्भर, नैतिक, श्रमशील और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त हो। उन्होंने शिक्षा को व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमताओं के विकास का साधन माना तथा इस बात पर बल दिया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवनोपयोगी कौशलों से संपन्न बनाते हुए उसे स्वावलंबन की दिशा में अग्रसर करे। गांधी द्वारा प्रतिपादित ई तालीम की अवधारणा इसी दृष्टिकोण पर आधारित थी। नई तालीम केवल पाठ्य ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें शिक्षा को श्रम, उत्पादक कार्य, नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया था। गांधी का विश्वास था कि शिक्षा तभी सार्थक हो सकती है जब वह व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्रदान करे तथा उसे समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने के योग्य बनाए। गांधी यह मानते थे कि शिक्षा और श्रम के बीच कृत्रिम विभाजन समाज में असंतुलन उत्पन्न करता है। इसी कारण उन्होंने शिक्षा प्रक्रिया में हस्तकला, उत्पादक कार्य और व्यावहारिक प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण स्थान दिया। उनका विचार था कि शिक्षा व्यक्ति के हाथ, मस्तिष्क और हृदय. तीनों का समान रूप से विकास करे। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति को केवल बौद्धिक रूप से सक्षम नहीं बनाती, बल्कि उसे जीवन के वास्तविक अनुभवों से भी जोड़ती है। वर्तमान समय में शिक्षा प्रणाली अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। बढ़ती बेरोजगारी, कौशल-अभाव, शिक्षा का व्यावसायीकरण तथा शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी जैसी समस्याएँ शिक्षा व्यवस्था की सीमाओं को स्पष्ट करती हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी अनेक युवा रोजगार और आत्मनिर्भरता की समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में गांधी का शिक्षा-दर्शन पुनः महत्वपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि उसमें शिक्षा को केवल रोजगार की प्राप्ति तक सीमित न रखकर जीवनोपयोगी कौशल, स्वावलंबन और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में गांधी के शिक्षा संबंधी विचारों, विशेष रूप से नई तालीम और स्वावलंबन की अवधारणा का विश्लेषण किया गया है। साथ ही वर्तमान सामाजिक एवं शैक्षिक परिस्थितियों के संदर्भ में गांधीवादी शिक्षा-दृष्टिकोण की प्रासंगिकता का अध्ययन करने का प्रयास किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष यह इंगित करता है कि गांधी की शिक्षा संबंधी अवधारणाएँ केवल ऐतिहासिक महत्व की नहीं हैं, बल्कि वर्तमान समय की समस्याओं के समाधान के लिए भी एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान करती हैं। गांधी ने शिक्षा के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है। यह कथन गांधी के शिक्षा-दर्शन की मूल भावना को व्यक्त करता है, जिसमें शिक्षा को व्यक्ति के संपूर्ण विकास तथा स्वावलंबन के साथ जोड़ा गया है।
मुख्य शब्दर- गांधी, नई तालीम, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता, शिक्षा, कौशल विकास।
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