हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति का स्वरूप
Abstract
हिंदी निबंध साहित्य में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम एक युग प्रवर्तक निबंधकार के रूप में स्मरणीय है। उनके निबंधों में लोकजीवन की सहजता, भारतीय संस्कृति की जीवंतता और मानवीय संवेदनाओं की गहराई का अद्वितीय संगम दिखाई देता है। द्विवेदी जी का साहित्य भारतीय लोक संस्कृति का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है, जिसमें समाज की परंपराओं, विश्वासों, आस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों की झलक मिलती है। प्रस्तुत शोधपत्र “हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति का स्वरूप” उनके निबंधों में निहित लोक चेतना और लोक संस्कृति के विविध आयामों का विश्लेषण करने का प्रयास करता है।
द्विवेदी जी के निबंधों में भारतीय समाज के आम आदमी का जीवन, उसकी लोक परंपराएँ, लोकगीत, उत्सव, मेले और उसकी सांस्कृतिक विरासत अत्यंत सहजता और आत्मीयता के साथ व्यक्त होती है। उन्होंने भारतीय लोक संस्कृति को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत जीवनशैली और सामाजिक चेतना के रूप में देखा। उनके निबंधों में गाँवों की सादगी, प्राकृतिक सौंदर्य और लोकमन की करुणा व उल्लास का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। वे मानते थे कि लोक संस्कृति ही किसी राष्ट्र की आत्मा होती है और इसके संरक्षण के बिना समाज का नैतिक और सांस्कृतिक विकास संभव नहीं।
शोधपत्र में उनके निबंधों जैसे अशोक के फूल, कुटज, कबीर आदि में लोक संस्कृति के चित्रण का विस्तार से अध्ययन किया गया है। साथ ही यह विश्लेषण किया गया है कि उनकी लोक दृष्टि भारतीय समाज की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विविधता और मानवीय मूल्यों को किस प्रकार पुष्ट करती है। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध साहित्य भारतीय लोकजीवन और उसकी सांस्कृतिक चेतना का कलात्मक दस्तावेज़ है, जो आज भी प्रासंगिक और प्रेरक बना हुआ है।
प्रमुख शब्द : हजारी प्रसाद द्विवेदी,निबंध साहित्य, लोक संस्कृति, सांस्कृतिक चेतना, भारतीयता
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