हिंददृप्रशांत क्षेत्र में शक्ति का पुनर्गठनर: ताइवान जलडमरूमध्य संकट के संदर्भ में भारत की भू-रणनीतिक वास्तुकला, डिजिटल संप्रभुता, और भारत- चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
Abstract
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन का पुनर्गठन तीव्र होता जा रहा है, जहाँ महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा, समुद्री भू-राजनीति और डिजिटल अवसंरचना का रणनीतिक महत्व निर्णायक भूमिका निभा रहा है। यह शोधपत्र ताइवान जलडमरूमध्य संकट की पृष्ठभूमि में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की उभरती भू-रणनीतिक संरचना का विश्लेषण करता है, जो वैश्विक आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा आयामों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। अध्ययन का तर्क है कि समकालीन भू-राजनीति अब केवल भू-क्षेत्रीय नियंत्रण तक सीमित नहीं रही, बल्कि समुद्री मार्गों, डेटा प्रवाह, आपूर्ति शृंखलाओं और डिजिटल संपर्कता के शासन द्वारा संचालित हो रही है। इसमें चीन के समुद्री विस्तारवाद, बेल्ट एंड रोड पहल और डिजिटल प्रभाव के माध्यम से क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में आए परिवर्तनों तथा भारत- चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की गहनता का विश्लेषण किया गया है। इसके प्रत्युत्तर में भारत ने समुद्री संतुलन, डिजिटल संप्रभुता, रणनीतिक साझेदारियों और मुद्दा-आधारित बहुपक्षवाद को अपनाते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि रणनीतिक लचीलापन भारत को नियम-आधारित, समावेशी और स्थिर हिंद-प्रशांत व्यवस्था में एक स्थिरीकरणकारी शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
मुख्य शब्द - हिंद-प्रशांत, ताइवान जलडमरूमध्य, भारत-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, समुद्री भू-राजनीति, डिजिटल संप्रभुता, रणनीतिक स्वायत्तता
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