भारत में जाति और राजनीतिः समकालीन दृष्टिकोण
Abstract
भारतीय समाज में जाति केवल एक सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठन, सत्ता-संरचना और नीति-निर्माण का भी एक महत्त्वपूर्ण आधार रही है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान ने समानता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया, किंतु सामाजिक यथार्थ में जाति-आधारित असमानताएँ और राजनीतिक धु्रवीकरण निरंतर विद्यमान रहे। समकालीन भारत में जाति और राजनीति का संबंध बहुआयामी रूप ले चुका है, एक ओर जाति-आधारित राजनीतिक लामबंदी ने हाशिए के समुदायों को प्रतिनिधित्व और सशक्तिकरण प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर यह पहचान-आधारित राजनीति सामाजिक विभाजन और चुनावी धु्रवीकरण का कारण भी बनी। यह शोध-पत्र जाति और राजनीति के पारस्परिक संबंधों का ऐतिहासिक, सैद्धांतिक और समकालीन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें औपनिवेशिक काल से लेकर वर्तमान समय तक जाति-आधारित राजनीतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से मंडल आयोग, आरक्षण नीति, क्षेत्रीय दलों का उदय, दलित और पिछड़ा वर्ग राजनीति, तथा डिजिटल युग में जाति की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि जाति भारतीय लोकतंत्र में एक जटिल यथार्थ है, यह सामाजिक न्याय के उपकरण के रूप में भी कार्य करती है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साधन के रूप में भी। अतः समकालीन राजनीति में जाति की भूमिका को समझने के लिए समावेशी नीतियों, शिक्षा, आर्थिक अवसरों और संवैधानिक मूल्यों की सुदृढ़ स्थापना आवश्यक है।
मुख्य शब्द- जाति व्यवस्था, राजनीति, सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति, मंडल आयोग, दलित राजनीति, पहचान की राजनीति, लोकतंत्र, समकालीन भारत
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