भारतीय जनजातीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा
Abstract
आदि काल से ही प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध रहा है। मनुष्य के विकास में प्रकृति का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किन्तु वर्तमान समय में प्रकृति के साथ मनुष्यों की अन्तःकिया का दायरा इतना व्यापक हो गया है कि अनेक पर्यावरणीय समस्याऐं बहुत विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व को बनाये रखने के लिये पर्यावारण संरक्षण की आवश्यकता है। पर्यावरण हास एवं प्रदूषण के कारण पृथ्वी के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है। समस्याओं के समाधान के सभी प्रयास विफल हो रहे हैं तथा वे नित नई समस्याऐं खड़ी कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हमारे चिंतन की दिशा तो नहीं भटक गई है, लगता तो ऐसा ही है। ऐसी स्थिति में भारतीय चिंतन की आधार भूमि का सहारा लेकर भारत के समाज विज्ञानियों को विश्व मंगल के लिये युगानुरूप नया चिन्तन प्रस्तुत करने के लिये आगे आना होगा। प्राचीन काल में विभिन्न जनजातियों ने स्वयं को पहचान देने के लिये विभिन्न जीव-जन्तुओं के नाम से अपने-अपने टोटम अपना लिये। टोटम पर आदर भाव और श्रद्धा होने के कारण सभी सदस्य उसकी पूजा करते है। प्रकृति का मूल स्वरूप ही हमारा पर्यावरण है जिसमें मानव जाति पालित-पोषित होती आ रही है। सारा संसार इसी पर्यावरण की सुरक्षा और शुद्धता को बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील है परन्तु आदिवासी आदिकाल से।
संकेत शब्द- जनजातियां, पर्यावरण, टोटम ।
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