तृतीय लिंग की सामाजिक स्थिति एवं वास्तविकता
Abstract
प्राचीन काल से ही भारतीय सामाजिक व्यवस्था लिंगाधारित तथा पुरुषवादी रही है अतः जिस समाज मे पौरूषता को ही आदर्श माना जाता हो, उस समाज में पुरुष लिंग के अतिरिक्त तमाम लैंगिक पहचानें पौरुषहीनता के साथ जोड़ कर देखी जाती है। इसी वैचारिक सोच ने समाज में भेदभाव तथा शोषण को जन्म दिया है। समाज का एक विशाल वर्ग स्त्री तथा किन्नर समाज इसका भुक्तभोगी रहा है। इन उपेक्षित वर्गों की भीड़ में यदि कोई वर्ग सर्वाधिक तिरस्कृत व मुख्य धारा से कटा हुआ है तो वह किन्नर समुदाय है। चूँकि तृतीय लिंग की यौनिकता व लैंगिक पहचान सामान्य स्त्री पुरुष से पृथक होती है। अतः उन्हे भारतीय समाज में एक वर्जित विषय के रूप में देखा जाता है। फलस्वरूप वह समाज की मुख्य धारा से पृथक हाशिये पर तिरस्कृत जीवन जीने को बाध्य होते है। भारतीय समाज में तृतीय लिंग हेतु हिजड़ा शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिसका आशय है अपना समुदाय छोड़ा हुआ। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार किसी शिशु का तृतीय लिंग में जन्म लेने का कारण पूर्णतः जैविक होता है जोकि गर्भधारण या गर्भावस्था के समय किन्ही ग्रन्थिस्राव (हार्मोन) असंतुलन या लैंगिक गुणसूत्रों के असमायोजन का परिणाम होता है। किन्नर होना मात्र एक प्राकृतिक शारीरिक दोष है इसका व्यक्ति की मानसिक स्थिति, कार्यक्षमता तथा जीवन शैली से कोई संबंध नही है।
संकेत शब्द: - तृतीय लिंग लैंगिक पहचान, सामाजिक स्थिति।
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