भारत की विदेश नीति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, सामरिक स्वायत्तता, वैश्विक भूमिका और समकालीन चुनौतियों का अध्ययन
Abstract
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जहाँ एकधु्रवीय विश्व व्यवस्था का स्थान धीरे-धीरे बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था लेती जा रही है। इस उभरती व्यवस्था में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपीय संघ, भारत तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ वैश्विक शक्ति-संतुलन को नए रूप में परिभाषित कर रही हैं। भारत, एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में, अपनी विदेश नीति को बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के अनुरूप पुनर्संरचित कर रहा है। भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषता उसकी सामरिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय प्रतिबद्धता, क्षेत्रीय संतुलन, तथा वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधि के रूप में उसकी भूमिका में निहित है। यह अध्ययन बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ में भारत की विदेश नीति के स्वरूप, उद्देश्यों, चुनौतियों और संभावनाओं का विश्लेषण करता है। शोध में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाएगा कि भारत किस प्रकार अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तथा दक्षिण एशिया के साथ अपने संबंधों को संतुलित करते हुए एक स्वायत्त और प्रभावी विदेश नीति का निर्माण कर रहा है। साथ ही, अध्ययन भारत की विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति, सामरिक साझेदारियाँ, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार, तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे आयामों की भी समीक्षा करेगा। यह शोध गुणात्मक पद्धति पर आधारित होगा, जिसमें पुस्तकों, शोध-पत्रों, सरकारी दस्तावेजों, नीति-पत्रों तथा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था में भारत केवल एक सहभागी शक्ति नहीं, बल्कि एक संभावित निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है। निष्कर्षतः यह शोध दर्शाएगा कि भारत की विदेश नीति अब परंपरागत गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर सामरिक स्वायत्तता, बहु-संरेखण, और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में विकसित हो रही है।
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