हिन्दी साहित्य के इतिहास का नारीवादी दृष्टिकोण से अध्ययन

Authors

  • डॅा0 सुमति सिंह

Abstract

हिन्दी साहित्य का इतिहास पारंपरिक रूप से पुरुष-केन्द्रित दृष्टिकोण से लिखा गया है, जिसमें स्त्री अनुभव, स्त्री संवेदना और स्त्री लेखन को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। नारीवादी दृष्टिकोण इस इतिहास की पुनर्व्याख्या करता है और उन उपेक्षित स्वर को सामने लाने का प्रयास करता है जो पितृसत्तात्मक संरचना के कारण हाशिये पर रहे। यह अध्ययन हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालोंकृआदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक कालकृमें स्त्री की उपस्थिति, उसकी अभिव्यक्ति और उसकी सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करता है। विशेष रूप से, भक्तिकाल में मीराबाई जैसी संत कवयित्रियों की स्वाधीन चेतना, आधुनिक युग में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि की रचनाओं में स्त्री विमर्श, तथा समकालीन साहित्य में स्त्री अस्मिता, समानता और अधिकारों के प्रश्नों को केंद्र में रखा गया है। नारीवादी आलोचना यह भी स्पष्ट करती है कि साहित्य केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं और शक्ति-संबंधों का दर्पण भी है। इस प्रकार हिन्दी साहित्य के इतिहास का नारीवादी अध्ययन न केवल साहित्यिक पुनर्मूल्यांकन करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
मुख्य शब्द- नारीवाद, हिन्दी साहित्य इतिहास, स्त्री विमर्श, पितृसत्ता, स्त्री अस्मिता, महिला लेखन, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय

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Published

30-09-2025

How to Cite

डॅा0 सुमति सिंह. (2025). हिन्दी साहित्य के इतिहास का नारीवादी दृष्टिकोण से अध्ययन. Ldealistic Journal of Advanced Research in Progressive Spectrums (IJARPS) eISSN– 2583-6986, 4(09), 128–134. Retrieved from https://journal.ijarps.org/index.php/IJARPS/article/view/1190

Issue

Section

Research Paper