सुशासन और पारदर्शिताः भारतीय संदर्भ में
https://doi.org/10.5281/zenodo.20578633
Abstract
एक आदर्श और न्याय पूर्ण राज्य व्यवस्था की खोज मानव सभ्यता के आरंभ से ही रही है। प्राचीन यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू ने इसके लिए प्रयास किया। वहीं प्राचीन भारत में मनु और कौटिल्य ने भी एक आदर्श राज्य व्यवस्था की खोज का अपना प्रयास किया। पूरी दुनिया में शासन और जनता के बीच किस प्रकार न्याय पूर्ण संबंध स्थापित किए जाएं जिससे जनता संतुष्ट हो सके और सत्ता व सरकार के प्रति उसकी निष्ठा और विश्वास बना रहे। आज की आधुनिक और लोकतांत्रिक युग में जब शासन सत्ता में जनता की भागीदारी अत्यधिक बढ़ गई है या यों कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक शासन का संचालन जनता के द्वारा ही किया जाता है। जनता के द्वारा ही सत्ता पर नियंत्रण रखा जाता है। तब ऐसी स्थिति में शासन और प्रशासन का न्याय पूर्ण होना और जनता के प्रति जवाबदेह होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता की चाभी जनता के हाथ में होती है। जनता जब चाहे तब किसी भी पार्टी की सरकार को सत्ता से हटा सकती है। इसलिए सुशासन और पारदर्शिता लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की सफलता के लिए अनिवार्य शर्त हो जाती है। भारत एक विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक विशाल देश है।जनसंख्या के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की वजह से भारत एक जटिल लोकतंत्र वाला देश बन जाता है। ऐसे जटिल लोकतंत्र वाले देश में सुशासन और पारदर्शिता अपने में स्वयं एक चुनौती बन जाती है। सुशासन से तात्पर्य ऐसे शासन व प्रशासन से है जिसमें शासन और प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदाई जवाबदेह, पारदर्शी और जनहितकारी हो। पारदर्शिता सुशासन की नींव है, क्योंकि बिना पारदर्शिता के भ्रष्टाचार और पक्षपात रहित शासन प्रशासन नहीं दिया जा सकता है। पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्टाचार पक्षपात और जन असंतोष बढ़ता है। जिसके परिणाम स्वरूप क्रांति अथवा राज्य के स्थायित्व के लिए खतरा उत्पन्न होता है।
मुख्य शब्द- लोकतांत्रिक शासन, सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही, उत्तरदायित्व और आदर्श राज्य व्यवस्था।
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