जल संकटः संरक्षण, प्रबन्धन चुनौती व आगे की राह, एक भौगोलिक विश्लेषण
Abstract
जल जीवन, पर्यावरणीय संतुलन, कृषि, उद्योग तथा मानव सभ्यता के सतत विकास का आधार है। वर्तमान समय में तीव्र जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित नगरीकरण, औद्योगिकीकरण, कृषि में भूजल के अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, वर्षा की अनिश्चितता तथा जल संसाधनों के असमान वितरण के कारण जल संकट एक गंभीर वैश्विक एवं क्षेत्रीय समस्या के रूप में उभर रहा है। भारत में भी अनेक क्षेत्र मौसमी जल-अभाव, भूजल स्तर में गिरावट, जल प्रदूषण तथा सूखे जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हैं। प्रस्तुत अध्ययन में जल संकट का भौगोलिक विश्लेषण करते हुए इसके स्थानिक एवं कालिक स्वरूप, प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों, जल संसाधनों की उपलब्धता तथा उनके असमान वितरण का अध्ययन किया गया है। अध्ययन में जल संरक्षण, जल प्रबन्धन और स्थानीय स्तर पर सामुदायिक सहभागिता की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जलागम विकास, सूक्ष्म सिंचाई, पारम्परिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग को संकट के समाधान के प्रभावी उपायों के रूप में रेखांकित किया गया है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र-विशिष्ट एवं विकेन्द्रीकृत जल प्रबन्धन रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि जल संकट केवल प्राकृतिक संसाधन की कमी नहीं, बल्कि संसाधनों के असमान उपयोग, कमजोर प्रबन्धन और बढ़ते मानवीय दबाव से जुड़ी बहुआयामी समस्या है। अतः जल सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक नियोजन, आधुनिक तकनीक, स्थानीय ज्ञान, जनभागीदारी तथा प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप के समन्वय से एक समेकित एवं टिकाऊ जल प्रबन्धन व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है।
मुख्य शब्द- जल संकट, जल संरक्षण, जल प्रबन्धन, भूजल, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास
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