भारत में डिजिटल विभाजन और आर्थिक असमानता
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.22996288
Abstract
इक्कीसवीं सदी में डिजिटल प्रौद्योगिकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन की आधारभूत शक्ति बन चुकी है। इंटरनेट, स्मार्टफोन, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएँ, ई-गवर्नेंस तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने नागरिकों के लिए अवसरों का एक नया संसार निर्मित किया है। भारत ने पिछले एक दशक में डिजिटल परिवर्तन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल इंडिया, भारतनेट, प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान, जनधन, आधार, मोबाइल व्यवस्था, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस, कॉमन सर्विस सेंटर तथा विभिन्न ऑनलाइन सरकारी सेवाओं ने डिजिटल पहुँच को व्यापक बनाया है। इसके बावजूद डिजिटल पहुँच, उपकरणों की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल कौशल, भाषा, लैंगिक समानता तथा डिजिटल सेवाओं के प्रभावी उपयोग में महत्वपूर्ण अंतर विद्यमान हैं। यही अंतर डिजिटल विभाजन कहलाता है। डिजिटल विभाजन केवल तकनीकी असमानता नहीं है, बल्कि यह आर्थिक असमानता से गहराई से जुड़ा हुआ सामाजिक-आर्थिक प्रश्न है। जिन व्यक्तियों और परिवारों के पास गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट, व्यक्तिगत स्मार्टफोन, कंप्यूटर, डिजिटल कौशल और ऑनलाइन सेवाओं तक नियमित पहुँच है, वे शिक्षा, रोजगार, वित्त, बाजार, सरकारी योजनाओं और उद्यमिता के अधिक अवसर प्राप्त कर सकते हैं। इसके विपरीत निम्न-आय, ग्रामीण, महिला, वृद्ध, दिव्यांग, कम शिक्षित और सामाजिक रूप से वंचित समूह डिजिटल अर्थव्यवस्था के लाभों से अपेक्षाकृत कम जुड़ पाते हैं। इस प्रकार डिजिटल विभाजन आर्थिक अवसरों के वितरण को प्रभावित करता है और कभी-कभी पहले से मौजूद आर्थिक असमानताओं को पुनरुत्पादित करता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट पर सूचना खोजने की क्षमता पुरुषों में 63 प्रतिशत तथा महिलाओं में 55 प्रतिशत थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह क्रमशः 74 और 69 प्रतिशत थी। इससे स्पष्ट है कि केवल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है; डिजिटल कौशल और उपयोग की क्षमता भी समान रूप से आवश्यक है। यह शोध-पत्र द्वितीयक आँकड़ों, सरकारी रिपोर्टों, नीतिगत दस्तावेजों और उपलब्ध अकादमिक साहित्य के आधार पर भारत में डिजिटल विभाजन तथा आर्थिक असमानता के अंतर्संबंध का विश्लेषण करता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि डिजिटल समावेशन को केवल इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। वास्तविक डिजिटल समावेशन के लिए किफायती उपकरण, विश्वसनीय एवं उच्च गुणवत्ता वाला इंटरनेट, स्थानीय भाषाओं में सामग्री, डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, लैंगिक समानता, सुलभ डिजिटल सेवाएँ तथा अंतिम छोर तक संस्थागत सहायता आवश्यक है।
प्रमुख शब्द- डिजिटल विभाजन, आर्थिक असमानता, डिजिटल समावेशन, डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट, ग्रामीण भारत, डिजिटल अर्थव्यवस्था, लैंगिक डिजिटल अंतर, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, समावेशी विकास।
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